कृण्वन्तो विश्वमार्यम
श्री निश्शुल्क गुरुकुल महाविद्यालय
Shree Nishshulk Gurukul Mahavidyalaya
Ayodhya, Faizabad
The Gurukul Ayodhya
स्वामी दयानन्द सरस्वती ने मानव के सर्वतोमुखी संस्कार और परिष्कार के लिए गुरुकुल शिक्षा पद्धति के प्रचार एवं प्रसार पर बल दिया था और उसे ही एकमात्र कल्याणकारी घोषित किया था | उनके पदचिन्हों पर चलने का व्रत लेने वाले स्वनाम धन्य स्वामी श्रद्धानन्द जी, स्वामी ब्रह्मानन्द जी, स्वामी दर्शनान्द जी एवं स्वामी त्यागानन्द जी सरस्वती आदि अनेक सन्तों ने महर्षि के इस परम तथ्य को स्वीकार कर उसे क्रियान्वित करने का संकल्प लिया था |
इसी क्रम में निश्शुल्क गुरुकुल महाविद्यालय की स्थापना स्वामी त्यागानन्द जी द्वारा श्रावण पूर्णिमा संवत् १६८२ विक्रमी तदनुसार सन १९२५ ई० को की गयी |
गुरुकुलोद्देश्याः -
- वेद वेदांगों के पठन पाठन से धार्मिक, समाजिक, नैतिक विद्वान उत्पन्न करके प्राणिमात्र के कल्याण के लिये समर्पित करना और गुण कर्मानुसार वर्णाश्रम की व्यवस्था करना |
- आर्य भाषा और संस्कृत के अध्ययन की विशेषता देते हुए शिल्प विद्या और पदार्थ विग्यानादि आधुनिकतम विषयों के अध्ययन का विस्तार करना |
- प्रचार और प्रातीच्य मौलिक तत्वों का समन्वय करने के निमित अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करना |
Swami Tyagananad Ji Saraswati
श्री स्वामी त्यागानन्द जी सरस्वती देवरिया जिले के कोहरौली (शुकरौली) स्थान पर एक चतुर्वेदी ब्राहमण कुल में माँ कमलेश्वरी की गोद में अवतीर्ण हुए | वह दिन था कार्तिक शुक्ल एकादशी सम्वत् १९४९ विक्रमाब्द | पिता पं० रामेश्वर प्रसाद चतुर्वेदी एक प्रसिद्ध ज्योतिषी एवं प्रकाण्ड विद्वान थे | बचपन से युवावस्था के बीच उन्होने संस्कृत व्याकरण आदि में पाण्डित्य प्राप्त कर लिया | वार्ता में वे संस्कृत ही बोलते थे | बाद में वे महात्मा हंसराज के तत्वावधान में पंजाब आर्य प्रतिनिधि सभा के महोपदेशक नियुक्त हुए | स्वामी सर्वदानन्द सरस्वती से सन्यास की दीक्षा लेकर स्वामी त्यागानन्द सरस्वती नाम के जीवन पर्यन्त सार्थक करते रहे |
अपनी विद्यास्थली संस्कृत पाठ्शाला की दयनीयता से उन्हे पुनः घर लौटना पडा | उन्होने सत्यमित्र, विद्यामित्र, विजयमित्र, रुद्रमित्र, ऋषिमित्र आदि विद्यार्थियों को ही लेकर उसी पाठशाला को गुरुकुल रूप में श्रावण पूर्णिमा सं० १९८२ के दिन परिवर्तित कर दिया | बाद में यही गुरुकुल अयोध्या के जालपानाला पर श्री मनु जी खत्री द्वारा प्रदत्त भूमि पर लाया गया | पश्चात इनके पुत्र स्वामी तत्व बोधानन्द सरस्वती द्वारा इसका सफल संचालन किया वर्तमान में महासभा उत्तरोत्तर संस्था के उन्नयन में तत्पर है |
अयोध्या गुरुकुल इनके सांस्कृतिक चिंतन का भी प्रतिबिम्ब था | स्वामी जी ओजस्वी वक्ता निर्भीक एवं कर्मठ सन्यासी थे | निश्शुल्क गुरुकुल संचालन का गुरुत्तर प्रभार होते हुए भी जीवन भर उन्होंने किसी धनी के समक्ष दयनीयता से हाथ नहीं फैलाया | अपने व्यक्तित्व एवं परिश्रम से, जो थोडा बहुत धन मिला उसी से संयमपूर्वक कार्य चलाते रहे | अयोध्या गुरुकुल आज भी अपनी सन्तोष वृत्ति पर ही बढ रहा है | यह उनके ही व्यक्तित्व का प्रभाव है | वे ७५ वर्षों तक उद्देश्य पूर्ति में लगे रहे | उन्हे निन्दा और स्तुति दोनो ही समान थी | १७ मार्च १९६० को प्रातः कालीन स्वर्णिम वेला में अपने स्वर्णिम पंख फैलाये वे राजहंस से अनन्त की ओर उड गये |
Principal's Message -
प्राचीन काल से वेदानुकूल ऋषि आश्रमों में संचालित शिक्षा बहुकाल तक सर्वव्यापक एवं सर्वग्राह्य रही | कालखण्ड के अन्तराल से नालन्दा एवं तक्षशिला जैसे विश्विद्यालय शिक्षा के केन्द्र के रूप में विकसित हुए, जहां आचार्यों के सानिध्य में शिक्षा प्राप्ति के लिये भारतीय ही नहीं अपितु समग्र एशिया महाद्वीप के शिक्षार्थी आकर्षित होते रहे | मानवीय उच्च आदर्शों एवं "वसुधैव कुटुम्बकम्" की भावना से ओत प्रोत ये शिक्षा केन्द्र अपना एक गौरवपूर्ण स्थान रखते हैं | वैदेशिकों के प्रभाव ने हमारी प्राच्य शिक्षा व्यवस्था को विश्रृंखलित कर स्कूली शिक्षा को जन्म दिया, जहॉं आचार्य और विद्यार्थी का सानिध्य अल्पकालिक ही रहता है | अधिकांश समय बालक अपने पारिवारिक परिवेश में ही व्यतीत करता है | व्यक्ति के सर्वांगीण विकास की कल्पना मात्र वैचारिक रूप लेकर रह गयी | आज इस वैश्वीकरण युग में आधुनिक ज्ञ्यान विज्ञान की शिक्षा हेतु भारतीयों का आकर्षण पाश्चात्य राष्ट्रों की ओर बढा है | वैदिक मूल के भारतीय शिक्षार्थी विदेशों में अपनी बौद्धिक क्षमता का उत्कृष्ट प्रदर्शन कर अपना गौरवपूर्ण स्थान बनाने में सफल रहे | परिणामस्वरूप वैदेशिकों में ईर्ष्या भाव का उद्भव होना स्वाभाविक था जिसके परिणामस्वरूप आस्ट्रेलिया, कनाडा आदि देशों में भारतीय प्रतिभाओं के साथ अमानवीय रूप से हत्या जैसे क्रूरतम व्यवहार किये जा रहें हैं |
भारतीय प्रतिभा वेद विहित सिद्धान्तों पर विकिसित है जिसका उद्घोष प्राचीन काल से ही "कृण्वन्तो विश्वमार्यम" रहा है | सम्प्रति अवैदिक आधार पर निर्मित राष्ट्रों के इस अत्याचार पर सम्प्रभुता सम्पन्न भारत राष्ट्र को तत्क्षण प्रभावी रोक लगाने के लिए पूर्ण मनोयोग से प्रयास कर शिक्षा के उदार स्वरूप की स्थापना में सहयोग करना चाहिए |